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Wednesday, 9 November 2022

डाकू का प्रायश्चित्त

उतंक मुनि विष्णु के परम भक्त थे। वह सौबीरनगर के एक मंदिर में रहकर भगवान की भक्ति, शास्त्राध्ययन तथा गृहस्थजनों को सदुपदेश देने में लगे रहते थे। राजा मुनि से बहुत प्रभावित था। उसने उस मंदिर को सोने का शिखर भेंट किया। उस क्षेत्र में डाकू कणिक का बहुत आतंक था। एक दिन वह अपने गिरोह के साथ मंदिर के पास से निकला, तो सूर्य की किरणों से चमचमाते स्वर्ण शिखर को देखकर रुक गया। उसने सोचा, जब मंदिर का शिखर सोने का बना है, तो यहां रहने वाले पुजारी के पास भी अवश्य धन होगा। उसने उसी रात मंदिर पर धावा बोल दिया। तलवार लिए वह मंदिर में घुसा, तो देखा कि एक महात्मा भगवान के ध्यान में लीन है। उसने महात्मा से कहा, 'सोना हमारे हवाले करो, अन्यथा काट डालूंगा। मुनि निर्भीक थे। वह ध्यान लगाए बैठे रहे। कणिक ने उन्हें धक्का दिया, लेकिन उसने देखा कि मुनि की आंखों से तेज बरस रहा है। उसके हाथ से तलवार बरबस ही छूटकर गिर गई। वह मुनि के सामने हाथ बांधकर खड़ा हो गया। मुनि उतंक ने मुस्कराते हुए कहा, 'किसी को सताकर प्राप्त किए गए धन से भला कभी नहीं होता। पश्चात्ताप से भरे कणिक ने सिर पटक-पटककर वहीं अपनी जान दे दी। मुनि ने उसके शव पर चरणामृत छिड़क दिया। कणिक को मुक्ति मिल गई। ( अमर उजाला आर्काइव से)

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